माँ पार्वतीआयुर्वेदिक

माँ एवं शिशु

प्रसव के बाद की देखभाल

बच्चा होने के बाद सारा ध्यान बच्चे पर चला जाता है, और माँ पीछे छूट जाती है। जबकि यही वह समय है जब उसका शरीर सबसे ज़्यादा टूटा हुआ होता है और सबसे ज़्यादा देखभाल माँगता है।

सवा महीना — पर अंधाधुंध नहीं

परंपरा में प्रसव के बाद के सवा महीने को अलग माना गया है, और इसमें बहुत समझदारी है — आराम, गरम और हल्का खाना, और भारी काम से दूरी। पर हर पुरानी रीत सही नहीं होती। माँ को कमरे में बंद रखना, नहाने से रोकना, या पानी कम पिलाना — इनसे नुक़सान होता है, फ़ायदा नहीं। हम वही सलाह देते हैं जो शरीर के काम आए।

आम तकलीफ़ें

किन परेशानियों में हम मदद करते हैं

  • कमज़ोरी और खून की कमी

    प्रसव में खून जाता है और शरीर निचुड़ जाता है। खून बढ़ाने और ताक़त लौटाने वाली दवा, और ऐसा खाना जो पचे भी और लगे भी।

  • दूध की कमी

    सबसे ज़्यादा पूछी जाने वाली बात। दूध बढ़ाने वाली परंपरागत चीज़ें, पर उससे पहले यह देखना कि माँ पर्याप्त खा-पी रही है और आराम कर रही है — दूध अक्सर वहीं अटकता है।

  • पेट और कमर

    पेट का ढीलापन और कमर दर्द आम है। सही समय पर पेट बाँधना, सुरक्षित तेल से मालिश, और हल्की सिंकाई — पर टाँके भरने से पहले नहीं।

  • कब्ज़ और बवासीर

    प्रसव के बाद बहुत आम, और टाँके हों तो और तकलीफ़देह। पेट नरम रखने वाली सुरक्षित चीज़ें, जो दूध पिलाने में बाधा न बनें।

  • नींद और थकान

    रात-रात भर जागना पड़ता है। ताक़त बनाए रखने वाली दवा, और घरवालों से साफ़ बात — माँ को दिन में सोने देना ज़रूरी है, आलस नहीं।

  • मन का उदास रहना

    बच्चा होने के बाद बहुत-सी माँओं का मन बेवजह भारी रहता है, रोना आता है। यह कमज़ोरी नहीं, आम बात है और इसमें मदद हो सकती है। घरवालों को यह समझना सबसे ज़रूरी है।

खान-पान

सवा महीने में क्या खाएँ

जो मदद करता है

  • गरम, ताज़ा और हल्का खाना
  • दलिया, खिचड़ी, दाल का पानी — शुरू के दिनों में
  • दूध, घी और गुड़ — पचने लगे तब
  • मेथी, अजवाइन, सोंठ जैसी परंपरागत चीज़ें
  • दिनभर गुनगुना पानी — दूध बनाने के लिए पानी ज़रूरी है

जिनसे बचें

  • बहुत ठंडा, बासी या बाहर का खाना
  • अधिक तला-भुना और तेज़ मिर्च
  • बिना पूछे कोई भी चूर्ण — दूध के रास्ते बच्चे तक पहुँचता है
  • तंबाकू और शराब — पूरी तरह
  • पानी कम पीना — यह पुरानी ग़लत रीत है

इन हालात में सीधे अस्पताल जाइए

प्रसव के बाद के हफ़्ते माँ के लिए सबसे ख़तरनाक होते हैं। इनमें से कुछ भी दिखे तो देर मत कीजिए।

  • बहुत ज़्यादा खून बहना — एक घंटे में पैड भर जाए
  • बुख़ार के साथ कँपकँपी
  • बदबूदार स्राव
  • स्तन में तेज़ दर्द, लाली और बुख़ार
  • टाँके से मवाद या बहुत दर्द
  • साँस फूलना, सीने में दर्द, या पैर में सूजन और दर्द
  • मन इतना भारी कि अपने या बच्चे के बारे में बुरे ख़याल आएँ — यह आपातकाल है

हमारे यहाँ

सवा महीने की दवा

ताक़त लौटाने और दूध बढ़ाने वाली दवा यहीं तैयार होती है।

  • जड़ी-बूटियाँ छाँटना

    जड़ी-बूटियाँ छाँटना

  • ताक़त की दवा की तैयारी

    ताक़त की दवा की तैयारी

  • माँ और शिशु

    माँ और शिशु

  • क्लिनिक

    क्लिनिक

सवाल-जवाब

जो अक्सर पूछा जाता है

दूध बढ़ाने की दवा कब से ले सकते हैं?

प्रसव के कुछ दिनों बाद से, जब पाचन सँभल जाए। पर पहले खाना, पानी और नींद देखी जाती है — अक्सर असली कमी वहीं होती है।

पेट कब बाँधना चाहिए?

सामान्य प्रसव में कुछ दिनों बाद, और ऑपरेशन हुआ हो तो टाँके भरने के बाद ही। बहुत कसकर बाँधना नुक़सान करता है।

क्या दवा से बच्चे को नुक़सान होगा?

जो दिया जाता है वह दूध पिलाने वाली माँ के लिए ही चुना जाता है। इसीलिए बताए बिना कुछ मत लीजिए — कई चीज़ें दूध के रास्ते बच्चे तक पहुँचती हैं।

परामर्श

प्रसव के बाद की देखभाल के लिए परामर्श

किस तकलीफ़ के लिए

प्रसव के बाद की देखभाल

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